द न्यूज 9 डेस्क।जबलपुर। सिहोरा। सिहोरा वन परिक्षेत्र सिहोरा के सिहोरा सर्किल के सरदा बीट में ग्राम घुघरा स्थित निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजर और दो अन्य कर्मचारियों द्वारा प्लांट के जंगल में भटक कर पहुंचे दो जंगली सुअर का शिकार करने और उसके बाद उनके शव को प्लांट क्षेत्र में गड़ा देने का मामला उजागर हुआ तो महकमें में हडकंप मच गया था। हरकत में आये वन विभाग जबलपुर सिहोरा की टीम ने तत्परता से कार्यवाही की वन विभाग को अपने मुखबिर से सूचना प्राप्त हुई की जंगली सुअर के शिकार में निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी शामिल है जिसपर कार्यवाही करते हुए तीन को जेल भेज दिया गया था। परंतु अब पूरे मामले को दबाने हरसंभव प्रयास के साथ बड़ी सेंटिंग, साजिश लीपापोती और चढोत्तरी के आरोप सामने आए हैं
प्रेस और मीडिया से बचते रहे अधिकारी
जुगली सुअर शिकार कांड में तीन आरोपियों की गिरफतारी और जेल जाने के बाद तक विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कोई आधिकारिक पुष्टि ना करते हुए एक दूसरे अधिकारी से बात करने और कथन लेने की बात करते रहे परंतु आज दिनांक तक इतनी बड़ी कार्यवाही में कोई आधिकारिक प्रेस कांप्रेस और प्रेस नोट जारी नहीं हुए और रेंजर साहब एसडीओ साहब से कथन वर्जन लेने की बात करते रहे और एसडीओ साहब मीडिया कर्मियों के कॉल नहीं उठाते रहे ताकि सच्चाई पर पर्दा डाला जा सके।
घटना स्थल सील करने से रोका और मामला दबाने भेज दिया अफसर
निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड जो 250 एकड़ के लगभग फैला हुआ है। उक्त स्थान पर ही जंगली सुअरों के शिकार कर दफनाने का पूरा कांड हुआ परंतु उक्त निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड प्लांट को सील करने से ही वन विभाग के अफसर ने रोक दिया और उल्टा डीप्टी रेंजर के पास विभाग के ही बड़गैंया जी को भेजकर मामला दबाने की बात की गई।
जबकि पूरे मामले में निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड केे मैनेजर अनुराग द्विवेदी जेसीबी ऑपरेटर बृजेश विश्वकर्मा मोहित दहिया को वन विभाग द्वारा जंगली सुअर के शिकार करने और उन्हे दफनाने के मामले में गिरफतार कर जेल भेजा था। परंतु इसके बाद ऐसा क्या जादू हुआ की उक्त निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड को सील करने से रोक दिया गया और मामला दबाने अपने विभाग के कर्मचारियों पर विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा दबाव डाला जाने लगा।
45 लाख का क्या है खेला ? धनतेरस पर हो गई क्या धनवर्षा ?
विभाग के ही डिप्टी रेंजर यादवेन्द्र यादव और बीट के फारेस्ट गार्ड जितेन्द्र अग्रवाल ने सीधे तौर पर आरोप लगाते हुए कहा कि इस पूरे मामले को दबाने हमारे पास बड़गैया जी आए थे और उन्होने रेंजर साहब का हवाला देकर मामले को दबाने की बात कही थी और उस दौरान मेरे चेंम्बर में बीट गार्ड रामचरण भी मौजूद रहे और पूरे प्रकरण को निपटाने दो गाड़िया विभाग में आई थी जिसमें मिठाईयां और चढ़ोत्तरी थी जिसमें किसी एक अफसर के लिए 30 तो दूसरे अफसर के लिए 15 लाख की भेंट भेजी गई थी, जिसके बाद आज डिप्टी रेंजर यादवेन्द्र यादव और बीट के फारेस्ट गार्ड जितेन्द्र अग्रवाल को निलंबित करके जांच से ही हटाने पूरी साजिश गढ़ी गई है।
डिप्टी रेंजर यादवेन्द्र यादव और बीट के फारेस्ट गार्ड जितेन्द्र अग्रवाल पर कार्यवाही ताकि हो सके पूरी लीपापोती
वन विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा जिस प्रकार की कार्यवाही की गई उनपर सवाल खड़े होना लाजमी है, क्योकि जब निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड में जंगली सुअरों से शवों को वरामद किया गया तो तत्काल उक्त निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड प्लांट के घटना स्थल वाले परिसर को सील क्यों नहीं किया गया। डीप्टी रेजर और बीट गार्ड को निलंबित करना था तो तत्काल क्यों नहीं किया गया, मीडिया को जानकारी देने से जिम्मेदार क्यों बचते रहे और मामले को दबाने के लिए विभाग के ही बड़गैंया जी को रेंजर साहब का हवाला देकर क्यो भेजा गया। उक्त सम्पूर्ण सवालों में जबाव भी हैं सेंटिग, लीपापोजी, चढोत्तरी की आती गंध इन सुलगते सवालों के क्या सीधे जबाव समझा जा सकता है।
जबकि घटना में निसर्ग इस्पात प्राइवेट लिमिटेड प्लांट का पूरा कैंपस सीसीटीवी कैमरों से लैस है। और चप्पे चप्पे पर कैमरा लगाकर निगरानी रखी जाती थी परंतु घटना के बाद कैमरों की रिकार्डिग रखने वाले डीवीआर में अचानक आग लग गई या सबूत मिटाने के लिए जला दिया गया और पूर्व में भी कितने जानवरों का शिकार किया गया है। और कौन कौन से राजों पर पर्दा डालने यह सब किया गया और कौन कौन से राजों पर पर्दा डाला जा रहा है। और किस किस अधिकारी की किससे संेटिंग हो गई और किसने कितने में अपना इमान बंेच दिया और नतमस्तक हो गए और किस किस मामलों में अपना ईमान बेंचा है। यह तो उच्च स्तरीय जांच पर ही पता चलेगा।
पूर्व में मृत तेदुआ का शव और चीतल के शिकार पर क्या हुआ
पूर्व में भी वन विभाग को दो मृत तेंदुआ और चीतल के शिकार कांड में कुछ मांस भी बरामद हुआ था उसपर कार्यवाही करने में वन विभाग के हाथ पैर फूल रहे थे और उस दौरान किसी अधिकारी कर्मचारी पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई थी। जबकि उक्त सुअर शिकार कांड में पर्याप्त सबूत और प्लंाट की भूमि पर ही दफनाए सुअरों के शव बरामद हुए। सीसीटीवी रिकार्ड गायब मिला, तो फिर कार्यवाही के नाम पर लीपोपोती क्यों। प्लांट सील क्यों नहीं किया गया, जांच करने वाले अफसरो को क्यों हटाकर, दूसरे अफसरों को चार्ज दिया गया। मामला दबाने विभाग के अफसर क्यों लग गए। क्या धनतेरस पर जमकर धनवर्षा को योग बना और जमकर धनवर्षा हुई और लक्ष्मी जी के दबाव के चलते या अन्य किसी दबाव में विभाग काम कर रहा।
उक्त मामले पर जब जब सिहोरा रेंजर आकाशपुरी गोस्वामी से संपर्क कर जानकारी चाही गई तो उनके द्वारा एसडीओ साहब से संपर्क करने की बात कही गई थी आज भी उक्त कर्मचारियों के निलंबन की कार्यवाही पर जब रंेजर सिहोरा से उनके कथन जानने मिडिया ने प्रयास किया तो रेंजर साहब आज भी कोई आधिकारिक पुष्टि करने से बचते रहे जबकि उक्त निलंबन की कार्यवाही में रेजर साहब ने अनुमोदन तो किया ही होगा। और साथ ही निलंबन की जानकारी उन्हे ना हो और बिना उनकी जानकारी के यह सब हो रहा ऐसा कैसे संभव है। साहब ने भी तो उक्त कार्यवाही पर कागजों में अपनी हस्ताक्षर वाली चिड़िया उड़ाई ही होगी।


















































































